नौकरी और परिवार छोड़ कर देश की सेवा में लग गए थे देश के गौरव 'कप्तान विक्रम बत्रा '

नौकरी और परिवार छोड़ कर देश की सेवा में लग गए थे देश के गौरव 'कप्तान विक्रम बत्रा '

 
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कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) ऐसे वीर थे जिन्हें केवल 24 साल की उम्र में ही कारगिल युद्ध (Kargil War)  में मरणोपरांत यह गौरव हासिल हुआ था।  इस युद्ध में कैप्टन बत्रा ने साहस के साथ बेहतरीन रणकौशल और धैर्य  का परिचय दिया।कैप्टन बत्रा को अपने आप पर पूरा भरोसा था। स्नातक की पढ़ाई के बाद उन्होंने संयुक्त रक्षा सेवा की तैयारी शुरू कर दी। विक्रम ने पालमपुर में स्कूल शिक्षा के बाद चंडीगढ़ में स्नातक की पढ़ाई की जिसके दौरान उन्होंने एनसीसी का सी सर्टिफिकेट हासिल किया और दिल्ली में हुई गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया जिसके बाद उन्होंने सेना में जाने का फैसला कर लिया।

  स्तानक की पढ़ाई के दौरान ही बत्रा मर्चेंट नेवी के लिए हॉन्गकॉन्ग की कंपनी में चयनित  हुए थे, लेकिन उन्होंने बढ़िया नौकरी की जगह देशसेवा तो तरजीह द।  1996 में इसके साथ ही सर्विसेस सिलेक्शन बोर्ड में भी चयनित होककर और इंडियन मिलिट्री एकेडमी से जुड़ने के साथ वे मानेकशॉ बटालियन का हिस्सा बने।  ट्रेनिंग पूरी करने के 2 साल बाद ही उन्हें लड़ाई के मैदान में जाने का अवसर मिल गया था।दिसंबर 1997 उन्हें जम्मू में सोपोर में 13 जम्मूकश्मीर राइफ्लस में लेफ्टिनेट पद पर नियुक्ति मिली जिसके बाद जून 1999 में कारगिल युद्ध में ही वे कैप्टन के पद पर पहुंच गए।

इसके बाद कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को श्रीनगर-लेह मार्ग के ऊपर अहम 5140 चोटी को मुक्त करवाने की जिम्मदारी दी गई।  कैप्टन ने अपने टुकड़ी  का बखूबी नेतृत्व किया और 20 जून 1999 के सुबह साढ़े तीन बचे चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। 

इसके बाद उन्हें रेडियो पर अपनी जीत पर कहा  ये दिल मांगे मोर जो हर देशवासी की जुबां पर चढ़ गया। विक्रम बत्रा की कहानी पर बॉलीवुड सिनेमा में ' शेरशाह' नमन एक फिल्म भी बनाई गयी थी जिसमे  सिद्धार्त मल्होत्रा ने विक्रम बत्रा का किरदार निभाया था।

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